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गोल रोटी बनाना सिखाने से पहले बेटियों को जवाब देना सिखाइए…

एक पत्रकार के तौर पर देखें तो बलात्कार, उत्पीड़न, शोषण जैसी घटनाओं की खबरों से रोज दो चार होना पड़ता है। ये हमारे लिए एक सिर्फ एक खबर होती हैं। हमारी कोशिश होती है कि हम पीड़ित की आवाज को न्याय की दहलीज तक पहुंचा सकें। एक खबर पर हमारा काम पूरा नहीं होता कि दूसरा मामला सामने आ जाता है। ऐसे में ये घटनाएं सामान्य लगने लगती हैं। लेकिन, हाथरस की जघन्य घटना ने न सिर्फ पुरे देश को झकझोरा है बल्कि एक बार फिर से महिलाओं के मसले पर एक बहस छेड़ दी है।

हाथरस की घटना पर लगतार खबरें लिख-पढ़ रहा था। उससे इतर कुछ लिखने की सोच रहा था, मगर समझ नहीं आ रहा था कि कहां से शुरू करूं। क्या लिखूं, क्या कहूं। लगातार सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं देख रहा हूं। लोग आरोपियों को फांसी देने की मांग कर रहे हैं। कुछ शरीया कानून की सजा जैसी आवश्यकता की बात कर रहे हैं। ये ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, बल्कि मैं तो ये कहूंगा कि ये आखिरी बार भी नहीं हो रहा है। दिल्ली की निर्भया से लेकर हाथरस की गुड़िया तक क्या बदला? मुझे लगता है कि कुछ भी नहीं। ना तो अपराध बदला, ना उसका तरीका और ना ही शासन का रवैया। हम तब भी सड़कों पर उतरकर निर्भया के लिए लड़े थे और आज भी वही हाथरस की गुड़िया के लिए कर रहे हैं। हम कभी कानून पर सवाल खड़े करते हैं तो कभी प्रशासन के रवैये पर। आप यकीन मानिये ये जो गड़िया के लिए चहुंओर गुस्सा दिख रहा ना, ये कुछ दिन बाद फिर सब नार्मल हो जाएगा। फिर हम शायद किसी और गुड़िया या निर्भया के लिए यही क्रम दोहरायेंगे।

अब आप सोच रहे होंगे कि मैं नया क्या बोल रहा। इसका अर्थ क्या है ? आप सही सोच रहे ना.. सही सोच रहे हैं आप। मैं न तो कुछ नया बोल रहा और ना ही इसका कुछ मतलब निकलने वाला है। ठीक उसी तरह जैसे आप प्रदर्शन कर रोष जता रहे और इसका भी कुछ निष्कर्ष नहीं निकलने वाला। उदाहरण के तौर पर निर्भया से लेकर गुड़िया तक के जनांदोलन को देख लीजिये। लेकिन मैं अपने मन की बात आपसे साझा करना चाहता हूँ। मुझे पता है कि मैं प्रधानमंत्री तो नहीं हूँ कि मेरे मन की बात का इतना वजन होगा। लेकिन, इतना दावा है कि इतनी हल्की बात भी नहीं करूँगा।

30 सितंबर की सुबह एक मेरी दोस्त का फ़ोन आया और उन्होंने कहा कि हाथरस की घटना की अपडेट भेजिए। हमने भेजी तो उन्होंने दुःख जताते हुए सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा व्यक्त किया। साथ ही दोबारा फोन करते हुए कहा – क्या जी, हम लोग बाहर निकलना बंद कर दें? ये आखिर कब तक चलेगा। क्या हमारी कोई आजादी नहीं है?…. मैं उनके इस सवाल का जवाब बस इतना ही दे पाया कि इसके लिए तो पहल और हिम्मत आपको ही दिखानी होगी। मैं ज्यादा बोल नहीं पाया। उन्हें बस फूलन देवी का एक उदाहरण ही दे पाया। शाम तक मेरी सहपाठी रहीं नेहा ने एक स्टेटस लगाया। जिस पर लिखा था – Teach your daughter how to slap in public and break leg. Gol roti can wait. (इसका अर्थ है- बेटियों को सिखाइये कि कैसे वो थप्पड़ मार सकती हैं और पैर भी तोड़ सकती हैं। गोल रोटी का तो इंतजार भी किया जा सकता है) इसे पढ़ने के बाद लगा कि अंग्रेजी के इन 15 शब्दों में मेरे दिल की पूरी भड़ास कह दी गई हो। फिर मैंने ये लेख लिखने का साहस किया। मैं हमेशा से इस बात का पक्षधर रहा हूँ कि बदलाव के लिए खुद आपको आगे आना होगा। अन्यथा बदलाव कभी नहीं आएगा।

इसी पोस्टर ने ये आर्टिकल लिखने पर विवश किया

क्या कहेंगे लोग?… इस सोच से निकलिए और परिवार को भी बाहर निकालिये

क्या कहेंगे लोग.. ये सिर्फ एक शब्द नहीं है। ये एक शुरुआत है अपराध की। अक्सर हम अपनी बेटियों और बहनों को इस शब्द के दायरे में बांधकर रख देते हैं। इतना बाँध देते हैं कि उनके मूल अस्तित्व को ही हम ख़त्म कर देते हैं। दुखद ये है कि आजादी के सात दशकों के बाद भी यह सोच हम पर अभी तक हावी है। संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने महिला अधिकारों के लिए मंत्री पद को त्याग दिया था। लेकिन, अधिकार मिलने के बाद भी इस सोच को हम आज तक त्याग नहीं कर पाए। हम अपनी बेटियों और बहनों को इस सोच में इस कदर तक बाँध देते हैं कि वे  अपने खिलाफ हो रहे अपराधों को चुपचाप सह जाती हैं लेकिन उफ़ तक नहीं करतीं। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो लड़कियां अक्सर अपने साथ कॉलेज, समाज, परिवार में होने वाली बदतमीजियों को सिर्फ इसलिए इग्नोर करती हैं कि बात आगे बढ़ेगी तो उनकी ही बदनामी होगी। बहुत हिम्मत कर परिवार में माँ-बहन को बता भी दें तो ज्यादातर मामलों में बदनामी का डर दिखाकर उन्हें चुप रहने की ही सलाह दी जाती है। सिर्फ इसलिए कि बात बाहर आएगी तो लोग क्या कहेंगे। यही डर भविष्य के एक बड़े अपराध को जन्म देता है। जो मारपीट, बलात्कार के रूप में हमारे सामने आता है। तब हम आवाज तो उठाते हैं लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

आंखों देखी है घटना

कुछ साल पहले की बात है। मेरी एक दोस्त (जिसका नाम लेना उचित नहीं होगा) की शादी एक अच्छे परिवार में तय हुई। वो अपने होने वाले पति से बात करती थी। मुलाकातें भी हुईं। शादी के कुछ ही दिन बाद दोनों के रिश्ते में दरार आई। वो भी ऐसी दरार की मारपीट और जान से मार डालने तक की नौबत आ गई। बाद में मेरी दोस्त ने बताया कि शादी के पहले भी वो बदतमीजी कर चुका था। दहेज को लेकर अक्सर नाराज रहता था। मम्मी-पापा, भाई-बहन सबसे इसका जिक्र किया। लेकिन, सबने यही कहा कि लड़का बड़ी मुश्किल से मिलता है। समाज में हमारी इज्जत है, शादी टूटेगी तो लोग बातें बनाएंगे। बड़ी बेइज्जती होगी। इसको हैंडल करो। किस रिश्ते में झगड़े नहीं होते… ऐसी तमाम बातें और मजबूरियां सुनाकर उसको चुप करा दिया गया। शादी के कुछ ही दिनों बाद मारपीट की घटना के बाद उसका तलाक हो गया। वो आज भी कहती है, शायद शादी के पहले ही यह निर्णय ले लेती तो आज अलग परिस्थिति होती। आज स्थिति ये है कि जब उसे सपनों का संसार सहेजना था तो वो कोर्ट के चक्कर लगा रही है। उसकी निराश आंखें पूछती हैं कि वो समाज कहां है जहां शादी तोड़ देने से सबकी इज्जत चली जाती। ये सिर्फ एक बानगी है। कई ऐसी घटनाएं हैं जिनमें हत्याएं तक हो जाती हैं। वो इसलिए, क्योंकि जब बोलना था तो हम सोच रहे थे कि लोग क्या कहेंगे….

हाथरस की घटना कोई एक दिन में घटी घटना नहीं है। ये मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ। वो दरिंदे कई दिनों से उसके पीछे रहे होंगे। छेड़ते रहे होंगे, छींटाकशी करते रहे होंगे, लेकिन लोकलाज के डर से ना तो वो कुछ बोली होगी ना परिवार… नतीजा आज सामने है।
तापसी पन्नू, अभिनेत्री, इनकी फ़िल्म थप्पड़ लड़कियों को एकबार जरूर देखनी चाहिए
लेने दीजिये उन्हें निर्णय, सम्मान कीजिये उनके फैसलों का
 
एक बेटी के पैदा होते ही उसके साथ बंदिशों की एक लंबी लिस्ट भी जन्म लेती है। उनका दायरा तय कर दिया जाता है। मां-बाप-भाई के आदेशों और उनके द्वारा तय किये गए दायरों में बचपन और जवानी का एक बड़ा हिस्सा बितता है। फिर पति-ससुर और सास की दुनिया में बंधकर जीवन का दूसरा हिस्सा… ऐसे में उनकी जिंदगी कहां है? उनके निर्णय कहां हैं? इसका ध्यान कौन देगा… क्या हम सिर्फ कैंडल जलाकर अपनी ड्यूटी निभाने वाले लोग हैं। बेटियों को जवाब देना सिखाना होगा। उनके फैसलों को अपनाना होगा। और हां क्या कहेंगे लोग…की सोच को दूर करना होगा।
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लेखक- सुशील कुमार
लेखक पेशे से पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं…
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  • हिन्दुस्तानी आवाम की याद्दाश्त कमजोर होती है, जल्द ही इस घटना को भी भुला दिया जाएगा । जमूरा कितना भी गुस्सा दिखा ले आखिर में मदारी के हाथो नाचेगा ही । व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के बिना यहाँ कुछ नही बदलेगा ।

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