उत्तर प्रदेश

संत रैदास का चिंतन आज भी प्रासंगिक- डॉ. अशोक सिद्धार्थ

संत शिरोमणि गुरु रविदास की 644वीं जयंती के मौके पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर स्थित केएन उडुप्पा सभागार में “भारत की वर्तमान समस्याओं के निवारण में संत रविदास के क्रांतिकारी चिंतन की भूमिका” विषयक संगोष्ठी का हुआ आयोजन

वाराणसी। संत शिरोमणि गुरु रविदास का चिंतन आज भी प्रासंगिक है उन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वह संतों की गैलेक्सी में ध्रुवतारा की तरह चमकते हैं संत रैदास ने अपनी विद्वता का लोहा मनवा कर देश की संकुचित मनुवादी विचारधारा को परास्त किया। उक्त बातें बसपा के राजसभा सांसद माननीय डॉ. अशोक सिद्धार्थआज काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर स्थित केएन उडुप्पा सभागार में कहीं। वह वहां संत सिरोमणि गुरु रविदास की 644वीं जयंती के मौके पर बीएचयू बहुजन इकाई की ओर से आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में “भारत की वर्तमान समस्याओं के निवारण में संत रविदास के क्रांतिकारी चिंतन की भूमिका” विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि अपनी बात रख रहे थे। डॉ. अशोक सिद्धार्थ ने कहा कि समाज में गैर बराबरी को गुरु रैदास के चिंतन बेगमपुरा को समाज मे स्थापित किया जा सकता है। उन्होंने युवाओं से, जिन्हें समाज मे परिवर्तन का आधार माना जाता है, बहुजन आंदोलन को आगे बढ़ाने, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने, संगठित होने और समाज में ऊर्जा भरने का काम करने की। साथ ही उन्होंने कहा कि दलित समाज को जो आरक्षण मिला है, वह बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर के प्रयास से मिला है। इसलिए बहुजन समाज के महापुरुषों के चिंतन को जमीनी स्तर पर उतारने की जरूरत है। उन्होंने भारत में बेरोजगारी, गरीबी और आरक्षण के मुद्दे पर संत रविदास के विचारों के प्रभाव का उल्लेख भी किया।
मुख्य वक्ता के रूप में दलित लेखक संघ की अध्यक्ष डॉ. अनिता भारती ने अपने उद्बोधन में कहा कि रैदास का चिंतन एक समाज वैज्ञानिक का चिंतन है। वे एक समाज वैज्ञानिक थे। सच में वह समाज के नायक थे। उन्होंने मध्यकाल में सामाजिक क्रांतिकारी चिंतन से समाज को उद्वेलित किया।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ आलोचक प्रो. चौथीराम यादव ने कहा कि कबीर और रैदास का भक्तिकालीन समय एक सामाजिक क्रांति का समय है। उसकी प्रतिक्रांति में बनारस समेत हिन्दी क्षेत्र में तुलसीदास को प्रचारित किया। रैदास का चिंतन सामाजिक बदलाव का क्रांतिकारी चिंतन है। बहुजन समुदाय को उनके चिंतन को अपनाना चाहिए। लोग बहुजन समुदाय के महापुरुषों के भक्त नहीं, उनके अनुयायी बनें, तभी उन्हें उनका अधिकार मिल पाएगा।
उप-जिलाधिकारी के रूप में कार्यरत शैलेंद्र प्रताप ने संगोष्ठी में कहा कि आरक्षित वर्ग से के लोगों के बारे में समाज में यह राय है कि इन समुदाय के लोग अपने पद के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं जबकि यह धारणा पूरी तरह से गलत है । लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में हुए शोध का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आरक्षित वर्ग से आया व्यक्ति ज्यादा कार्यशील और वफादार होता है। वह ऐसे मामलों में ज्यादा परिश्रम करता है। उन्होंने बहुजन समाज में भड़ते सुपीरियर और इंफिरियर के मनोभाव को समाज के लिए नुकसानदेय बताया।
बीएचयू बहुजन इकाई के संरक्षक और भूतपूर्व प्रोफेसर कृषि वैज्ञानिक प्रो. लालचन्द प्रसाद ने कहा कि गुरु रैदास की ही तरह आपको भी क्रांतिकारी और विचारवान बनना होगा, तभी समाज मे वैचारिक क्रांति आएगी। संगोष्ठी को डॉ रूपचंद गौतम एवं शिवनाथ शीलबोधि ने भी संबोधित किया।
विषय प्रस्तावना डॉ प्रतिमा गोंड ने किया। संगोष्ठी की अध्यक्षता महेश प्रसाद अहिरवार ने की अतिथियों का परिचय रविंद्र प्रकाश भारती ने, कार्यक्रम का संचालन विवेकानंद एवं रेखा विजेता तथा आभार ज्ञापन सूर्यमणि गौतम ने किया।
उक्त अवसर पर मंचासीन अतिथियों द्वारा रूपचंद गौतम द्वारा आठ खंडों में लिखित पुस्तक “अम्बेडकर जनसंचार” का लोकार्पण किया गया।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रो आर.के. गौतम, प्रो. आरएन खरवार, प्रो संजय सोनकर, प्रो केएन सिंह, प्रो निर्मला होरो, डॉ सुजाता गौतम, डॉ. प्रमोद बांगडे, प्रो. बृजेश कुमार अस्थवाल, डॉ. शिवेंद्र कुमार मौर्य, मा. इंदलराम, मा. अमरजीत गौतम, मा. रघुनाथ चौधरी जी, मा अनीश कुमार जी, मा राजेश भारती जी, मा रमेश भारती,, सुरेश भारती, चांदनी कुशवाहा, अनामिका कुमारी, चंदन सागर, महेश प्रसाद, परमजीत पटेल समेत सैकड़ों लोग एवं छात्र छात्राएं शामिल रहे।

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