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पेरियार-अम्बेडकर के साथी व कांशीराम के गुरु शिवदयाल चौरसिया को भूलता समाज

Bharatvani Samachar, Lucknow :
समाज में कुछ परिवर्तन ऐसे होते है जिनके बारे में तो हमको पता होता है किंतु उसके पीछे सँघर्ष करने वालो को हमारा समाज भूल जाता है। ऐसे ही एक नाम समय के शिला लेख पर धूमिल सा हो गया। किंतु वह अमिट है। हम ऐसे एक नायक की चर्चा कर रहे है जिसे पेरियार रामस्वामी और बाबा साहब का अभिन्न अंग माना जाता था। वह व्यक्ति जिसने कांशीराम के सामजिक परिवर्तन अभियान को दिशा प्रदान की। वह राजनीतिक क्रांति के साथ साथ आर्थिक एवं सामजिक क्रांति चाहते थे। वह सच्चे अर्थो में देश भक्त थे। जिस व्यक्ति को समाज में चौरस घोलना था ऐसे ही नायक, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, सांसद, प्रथम पिछड़ा वर्ग (काका केलकर) आयोग के सदस्य,  विधिक परामर्श मुफ्त करवाने वाले, लेखक, चिंतक स्वर्गीय शिवदयाल चौरसिया जी थे। शिवदयाल चौरसिया लखनऊ निवासी थे किंतु वह देशव्यापी गरीब,वंचित  वर्ग के नेतृत्वकरता थे। मनुष्यों द्वारा मनुष्यों शोषण नही रुकेगा तो आज़ादी मिलकर भी बस गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज आ जायेंगे भगत सिंह के इस कथन को शिवदयाल को आत्मसात करते हुए सामजिक विषमता से लड़ रहे थे। उन्होंने पूरे देश में डिप्रेस क्लास लीग का गठन किया। जो पूरे देश में गरीब,वंचित वर्ग में जागरूकता, शिक्षा का महत्व एवं इन वर्गों के हितों के लिए लड़ाई लड़ रही थी।
शिवदयाल जी का जन्म 13 मार्च 1903 को लखनऊ के खरिका (तेलीबाग) में हुआ। आपने बी एस सी, एल एल बी को शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की।आपने 1929 में वकालत प्रारंभ की। वह हाइकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के प्रतिष्ठित वकील रहे। उन्होंने वकालत करते हुए इस दर्द को समझा और अनेको गरीबो की नि शुल्क सहायता की। उनकी इसी भावना ने आगे चलकर “सेंट्रल लीगल एड सोसायटी” रूप लिया इसका मुख्यालय दिल्ली में था। यह संस्था पूरे देश में गरीब वंचित जनों को मुफ्त न्याय दिलाती थी। चौरसिया जी अपने संसदीय कार्यकाल में भारतीय संविधान में अनुछेद 39 ए जुड़वाकर मुफ्त विधिक परामर्श प्रदान करवाया। जिसने आज लोक अदालत का रूप धारण किया है। वह सर्वप्रथम डॉ अम्बेडकर जी से डिप्रेस क्लास सम्मलेन नागपुर 1928 में मिले जहाँ उस सम्मेलन के सभापति डॉ अम्बेडकर और उप सभापति शिवदयाल जी थे। जिसके बाद शिवदयाल जी उत्तर भारत में ड्रा अम्बेडकर के सेनापति हो गए। जिसके बाद डॉ अम्बेडकर जी का लखनऊ आना जाना शुरू हुआ। 8 दिसम्बर 1930 को रिसालदार पार्क अमीनाबाद बैकवर्ड क्लास लीग का स्थापना अधिवेशन हुआ। जिसमें देश भर के नेता शामिल हुए। इस अधिवेशन में डॉ अम्बेडकर मुख्य अतिथि थे। इसी बीच अंग्रेजो द्वारा लंदन में 1930,31,32 तीन गोलमेज सम्मेलन हुए जिसमे शिवदयाल जी आमंत्रित थे किंतु वह किन्ही करणोवश वहाँ जा न सके। जिसका उनको जीवनभर दुःख रहा।
Shivdayal Chaurasiya
3 फरवरी 1932 को डॉ अम्बेडकर लखनऊ आये थे जिसके बाद शिवदयाल जी ने वंचित वर्गों को अधिकार दिलाने हेतु रणनीति तैयार की। जिसके बाद पूरे देश में बेकवर्ड लीग के विस्तार शुरू हुआ। आपने सर्वप्रथम पिछडो और दलितों को कैडर अर्थात अपने अस्तित्व की पहचान कराके जागरूक करना शुरू किया। जिसको सफलता मिली और पूरे देश में लीग का विस्तार हुआ। जिसके बाद बिहार में दादू सिंह एडवोकेट ने अधिवेशन बुलाया। बंगाल में राय मोहन पाल संगठन बनाया। मद्रास में बी एम घटिकाचलम संगठन बनाया। पंजाब में सन्तराम बी. ए एवं बाल कृष्ण के नेतृत्व में संगठन बना। मध्यप्रदेश प्रदेश दिसम्बर 1934 में अधिवेशन हुआ। जिसके मुख्यातिथि शिवदयाल जी थे। बम्बई में गोवर्धन दास के नेतृत्व में संगठन बना। दिल्ली में चंदीमल के नेतृत्व संगठन बना। इस प्रकार अपने जीवन के 20 वर्ष शिवदयाल जी ने बेकवर्ड क्लास लीग को खड़ा करने में लगाए। जिसका परिणाम यह हुआ की पूरे देश में वंचित वर्ग में अपने अधिकारों के प्रति चेतना आई। 1945 में पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए शिवदयाल जी ने के डेलिगेशन बनाया जिसमे गौरीशंकर पाल एडवोकेट,तारा चन्द्र सविता, बदलू रामरसिक, स्वामी अछूतानन्द एवं अन्य 20 लोग थे। इस प्रतिनिधि मंडल ने देश में पिछड़े वर्गों की दशा पर एक रिपोर्ट तैयार की थी। जिसे माउंटबेटन, महात्मा गांधी, डॉ अम्बेडकर जैसे अनेको प्रमुख व्यक्तियों को देकर डेलिगेशन ने देश पिछड़े वर्गों सामजिक, आर्थिक असमानता को बताया। 25 अप्रैल 1948 को शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के सम्मेलन में शिवदयाल और डॉ अंबेडकर मिले जहाँ पूरे देश में पिछड़े वर्गों को एक करने पर चर्चा हुई। 1950 भारतीय बेकवर्ड क्लास फेडरेशन का अधिवेशन हुआ जिसके सभापति शिवदयाल जी थे।
भारत आज़ाद हो गया लेकिन शिवदयाल जी के प्रयासों द्वारा अनुछेद 340 संविधान में जुड़ तो गया किंतु लागू नही हो पाया। संविधान निर्माण के बाद देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी ने 29 जनवरी 1929 को पिछड़े वर्गों के उत्थान, प्रगति एवं वर्तमान दशा को समझने के लिए एक काका केलकर कमीशन गठित हुआ। इसे पिछड़ा वर्ग आयोग का नाम दिया गया। इस आयोग के अध्यक्ष श्री काका केलकर बने शिवदयाल जी विधायक और सांसद न होते हुए भी इस आयोग के सबसे पहले सदस्य बने। हालांकि इस आयोग की सिफारिश नही मानी गई। यही आयोग मंडल कमीशन का आधार बना जिसमे शिवदयाल जी के अनेको मतों को शामिल किया गया। 30 अगस्त 1953 में बेकवर्ड क्लास फेडरेशन का अधिवेशन शिवदयाल जी ने लखनऊ में किया। उत्तर प्रदेश में जब पहली पिछड़ी जातियों की सूची 1958 में लागू हुई तो वह शिवदयाल जी द्वारा कलमबद्ध थी। मंडल कमीशन ने भी इसे स्वीकार किया। 1958 में आपने और छेदी लाल साथी जी ने पेरियार की विशाल जन सभा करवाई।आप लागतार समाज में वंचितों को सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए लड़ते रहे। आपने 1967 में इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली से चुनाव लड़ा किंतु हार गए।आपने ने 1974 में राज्यसभा का चुनाव लड़ा और के के बिरला जैसे उद्योगपति के मुकाबले आप कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। इसी बीच 1974 में कांशीराम जी की मुलाकात शिवदयाल जी से पूना मे हुई। जिसके बाद शिवदयाल जी कांशीराम जी ने गुरु मान लिया। कांशीराम राम उन्हें गुरु ही कहते थे। शिवदयाल कांशीराम जी की खूब मदद की और उनको अपना सरकारी आवास रहने को दिया। जहाँ से बामसेफ संगठन की नीव पड़ी यही आवास बामसेफ का ऑफिस बना। 1975 संविधान में अनुछेद 39 ए जुड़वाकर मुफ्त विधिक परामर्श प्रदान करवाया। 6 दिसम्बर 1978 को दिल्ली बोट क्लब में बामसेफ के स्थापना दिवस में कर्पूरी ठाकुर और शिवदयाल जी मुख्यातिथि रहे। आपने वहाँ क्रांतिकारी भाषण दिया। आप 1980 तक सांसद रहे।
आपने बामसेफ के बिस्तार को देखते हुए अपना सरकारी आवास पूर्णता कांशीराम जी को सौप दिया। आप किराये के मकान में रहने लगे। आप संसदीय कार्यकाल खत्म हुआ। इसी बीच सरकारी बंगले का किराया का बिल आपको मिला अपने हर्ष से 90 हजार का बिल भरा। आपने कहा बामसेफ मेरा संगठन है। कांशीराम जी ने आपके मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश में बामसेफ का विस्तार किया। आपने लखनऊ में कैडर कैम्प बना दिया। जिसमे आप ट्रेनिंग देते थे और कार्यकता तैयार करते थे। इसी में कांशीराम रुकते आज भी लोग कांशीराम आवास के नाम से जानते है।जो गाँव-गाँव जाकर लोगो को अपने अधिकारों के लिए जगाते थे। आपकी सलाह पर ही कांशीराम जी ने 1981 D-S4 का निर्माण किया। शिवदयाल जी से विचार विमर्श के कांशीराम जी ने मूवमेंट को मजबूत करने के लिए देशव्यापी यात्रा का निर्णय लिया। 14 अप्रैल 1984 को बाबासाहब के जन्मदिन पर कांशीराम जी ने ‘बहुजन समाज पार्टी’ की स्थापना की। उद्देश्य स्पष्ट था- राजसत्ता की चाबी पर कब्जा करना था। अब शिवदयाल जी स्वथ्य खराब रहने लगा जिससे वह सामजिक रूप कम सक्रिय रहने लगे। किंतु मन से वह मूवमेंट को मजबूत होते देखना चाहते थे
15 अगस्त 1988 से 15 अगस्त 1989 के बीच कांशीराम ने पांच सूत्रीय सामाजिक रूपान्तरण आन्दोलन चलाया। ये पांच सूत्र थे- आत्मसम्मान के लिए संघर्ष, मुक्ति के लिए संघर्ष, समता के लिए संघर्ष, जाति उन्मूलन के लिए संघर्ष और भाईचारा बनाने के लिए संघर्ष। इसके लिए कांशीराम ने देश के पांच कोनों से साइकिल यात्रायें निकालीं। पहली यात्रा 17 सितम्बर 1988 को कन्याकुमारी से पेरियार के जन्मदिन पर, दूसरी यात्रा कोहिमा, तीसरी कारगिल, चौथी पुरी, और पांचवी पोरबन्दर से चली। ये सभी यात्रायें 27 मार्च 1989 को दिल्ली में पहुँचकर आपस जुड़ गयीं।
1993 में जब बसपा सपा गठबन्धन की सरकार बनी तो शिवदयाल जी ने डाईविटीज से ग्रसित होने के बावजूद उस दिन मिठाई खाई और कहा की आज मेरा जीवन सफल हुआ। उसके बाद शिवदयाल जी का स्वस्थ्य खराब रहने लगा और उन्होंने 18 सितंबर 1995 को अन्तिम सांस ली। इसी के साथ पेरियार रामस्वामी, डॉ अम्बेडकर और कांशीराम को जोड़ने वाला सेतु टूट गया। अपना सम्पूर्ण जीवन वंचितों को सम्मान और अधिकार दिलाने के समर्पित करने वाले शिवदयाल जी पुण्यआत्मा को नमन।
Satish Samar, Socialist Writer
                                                                                         (सतीश समर, समाजवादी चिंतक)

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