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बिजनौर में अगस्त क्रांति और नूरपुर थाना कांड

Interesting Facts about August Revolution
Interesting Facts about August Revolution

 

ऊपर दर्शाया गया यह चित्र अगस्त क्रांति/अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ा है और हेमंत कुमार ने इसको अपनी प्रस्तावित पुस्तक के लिए बनाया है । 

इतिहास लेखक- हेमंत कुमार

   

Bharatvani Samachar(Agency):आजादी के लिए सन 1942 में गांधीजी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी। जनपद बिजनौर के क्रांतिकारियों ने इस आंदोलन के क्रम में 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाने में स्वराज के प्रतीक तिरंगे को फहराने का निर्णय लिया। पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार 16 अगस्त को नूरपुर तथा आसपास के गाँवों के लगभग बारह हजार लोग तिरंगा फहराने के लिए थाने पर पहुँच गये। पुलिस ने क्रांतिकारियों को थाने में घुसने या तिरंगा फहराने पर गोली मारने की चेतावनी दी। सबसे पहले गुनियाखेड़ी गाँव के परवीन सिंह ने इस चुनौती को स्वीकारा और भारत माता की जय का सिंहनाद करते हुए तिरंगा लेकर थाने में घुस गए। पुलिस ने पलक झपकते ही तीन चार गोली मारकर उन्हें गिरा दिया। कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। पुलिस को लगा कि अब शायद ही कोई आगे बढ़े। जो भी आगे बढ़ता उसे गोली लगना तय था। मौत सामने खड़ी थी। अब असाधारण वीरता और देश की आन के लिए मर मिटने की परीक्षा थी। उधर जनसमूह में भी एक से बढ़ कर एक वीर मौजूद था। ऐसे ही एक परमवीर ग्राम असगरीपुर के रिक्खी सिंह ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए तिरंगा फहराने के अधूरे काम को पूरा करने के लिए कदम बढ़ाया। रिक्खी सिंह ने बहुत फुर्ती से परवीन सिंह के हाथ से तिरंगा निकाला और उसे लगाने का प्रयास करने लगे। यह देख पुलिस ने उन्हें भी गोली मारकर गिरा दिया। गोली भले ही खानी पड़ी पर वे अपने प्रयास में सफल रहे। इतिहास का एक और स्वर्णिम अध्याय लिखा जा चुका था। कुछ क्रांतिकारी अपने घायल साथियों को थाने से बाहर ले जाने का प्रयास करने लगे। तो पुलिस ने उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना के थोड़ी देर बाद ही परवीन सिंह का प्राणान्त हो गया। गिरफ्तार क्रांतिकारियों को बिजनौर जेल भेज दिया गया। जहाँ इलाज के दौरान रिक्खी सिंह भी शहीद हो गये। रिक्खी सिंह का प्रयास देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देने का दुर्लभतम उदाहरण बना। ग्राम ढेला अहीर के मुंशीराम तथा ग्राम गोहावर के नत्थू सिंह भी थाने में गोली लगने से घायल हुए थे। पुलिस की लाठियों से ग्राम फीना के क्षेत्रपाल सिंह के पैर में बड़ी चोट लग गयी थी। उनके साथियों ने उन्हे अपने कंधे पर बैठकर सुरक्षित जगह पहुंचाया। अमरोहा मार्ग से थाने जा रहे कई गांव के क्रांतिकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने चाँदपुर चौराहे पर भी लाठीचार्ज किया था। इसमें ग्राम फीना के डॉक्टर भारत सिंह के सिर में गंभीर चोट आई थी। देश और तिरंगे का मान रखने के लिए परवीन सिंह तथा रिक्खी सिंह ने सामने खड़ी मौत को चुनौती दी और जान न्योछावर करते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया फिर भी ये वीर राष्ट्रीय पटल पर गुमनाम ही रह गये। इस चित्र को ज्ञात और गुमनाम उन सब क्रांतिकारियों की स्मृति में श्रद्धांजलि स्वरूप बनाया गया है जो 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाने पर तिरंगा फहराने के लिए पहुँचे थे। चित्रांकन हेमंत कुमार ग्राम फीना जनपद बिजनौर द्वारा किया गया है । स्वतन्त्रता दिवस की बेला पर सभी सेनानियों को सादर श्रद्धांजलि और शत शत नमन।

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